जीवन प्रबंधन के लिए अति आवश्यक है राजयोग – डॉ राधाकृष्णन 

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योग की शक्ति ने मुझे जीवन में विशामतम  परिस्थितियों को सामना करने के काबिल बनाया और मुझमें एक ऐसी अनोखी शक्ति भर दी कि आज मैं जीवन की किसी भी परिस्थिति को सहज ही पार कर पाता हूँ | वैसे तो कई लोग ये मान्यता रखते हैं कि आध्यात्मिकता एक ऐसा विषय है जिसके विषय में हमे ६० वर्ष की आयु के बाद ही सोचना चाहिये, इस से पहले इसके विषय में सोचना एक भूल ही होगी | परन्तु आज की परिस्थितियों और परेशानियों से भरे इस तकनीकी युग में बहुत आवश्यक है कि हम अपने मन को शांत और स्थिर रख पायें | यदि हम ऐसा कर पाने में असमर्थ होते हैं तो विश्व का कोई भी प्रबंधन संस्थान हमें मदद करने में असमर्थ ही अनुभव करेगा | प्रबंधन हमें सिखाता है कि कैसे हम बाहरी जगत के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करें  और लोगों को  बेहतर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करें | आध्यात्मिकता हमें सिखाती है कि कैसे हम हम अपनी आन्तरिक शक्तियों रुपया संसाधनों का प्रयोग कर अपने मन से बेहतर कार्य कैसे करवा पायें| यदि आंतरिक स्टार पर हमारा मन स्थिर नहीं होगा तो क्या हम दुसरे लोगों को बेहतर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित कर पाएंगे | जो दीपक स्वयं बुझा हुआ हो वो दुसरे दीपकों को जलने में समर्थ हो सकता है क्या|

प्रबंधन में आध्यात्मिकता का महत्व 

प्रबंधन में हम जीवन के पहलुओं के विषय को परिदृश्यों तथा सिद्धांतों के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं परंतुय व्यवहारिक पहलुओं को संमझने के लिए राजयोग मैडिटेशन सीखना अति आवश्यक है | प्रबंधन के सिद्धांत हमें व्यवहारिक बातें सिखाने के लक्ष्य से बनाये गए हैं पर सही मायने में व्यावहारिकता हम तभी सीख पाते हैं जब योग के माध्यम से हम स्वयं को जों दूसरों को भी समझने लगते हैं|

 

आध्यात्मिकता प्रबंधन में किस प्रकार सहायक है
आध्यात्मिकता  हमारा सर्वांगीण विकास करने में , निर्णय शक्ति को बढाने में तथा अपने निज स्वार्थ से ऊपर उठकर सर्व के कल्याण प्रति सोचने में हमें मदद करती है | इस से युवा पीढ़ी के लोगों को समय प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ती है और वे कार्यक्षेत्र और पारिवारिक जीवन का एक बेहतरसंतुलन बना पाते हैं |
योग हमें परिस्थितियों को सही मायने से समझने में बेहद लाभकारी साबित होता है और हम साक्षी भाव से एक समग्र दृष्टिकोण के साथ बेहतर निर्णय ले पाने में सफल हो पते हैं| सहयोगियों के प्रति सही दृष्टिकोण को विकसित करने में मदद करता है और मेरे निज जीवन में पिछले 5 साल से कॉलेज के डीन के रूप में एक आदर्श भूमिका निभाने में ये मेरे बहुत ही उपयोगी साबित हुआ है| योग हमें जीवन में ऐसी चुनौतियों स्वीकार करने के काबिल बनता है जो अन्यथा हम बहुत ही कठिन और असंभव मानते|

 

प्रोफेसर राधाकृष्णन, आई.आई. एम. कोंज़िकोड़  के डीन के रूप के कार्यरत हैं तथा प्रजापिता ब्रह्मकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय से पिछले १६ वर्षों से नियमित रूप से जुड़े हुए हैं

कुंवरानी से बनी परमात्मा के दिल की राजकुमारी 

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कुंवरानी  माया सर्वाणि का जन्म: झारखण्ड  के चैनपुर राज्य की राजकुमारी के रूप में हुआ तथा विवाह पश्चात वे  गर्रोली राज्य (मध्य प्रदेश) की कुंवरानी बनी( उन्हें आध्यात्मिक  जगत के लोग प्यार से  रानी सा के नाम से जानते हैं ( उनके जीवनमा के कुछ प्रश्न और जीवन के सच्चे अर्थ की खोज उन्हें प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय तक खींच लाई और रानी सा कुंवरानी के साथ साथ अब एक कुशल राजयोगिनी भी बन बन गयीं  ( उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने की कोशिश की शिव आमंत्रण के संवाददाता बी.के. सौरभ ने (
एक बहुत ही संस्कारी राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाली रानी सा के मन में बचपन से ही भक्ति भावना कूट कूट कर भरी हुई थी( गीता , रामायण  तथा अन्य पुराणों का नित्य पाठ करना उनके जीवन का एक अभिन्न अंग था( विशेषतः माँ दुर्गा में प्रगाढ़ निष्ठा रखने वाली रानी सा के मन में कई ऐसे अद्यात्मिक प्रश्न थे जिनका उत्तर खोजने का उन्होंने बहुत प्रयास किया  परंतु उन्हें कही भी अपनी इस अंतरात्मा के प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला (

5 वर्ष की उम्र से ही दुर्गा की अनन्य भक्त बन गयीं

एक बार बचपन में जब रानी सा बहुत बीमार हो गयीं थीं तब उनके परिवार ने बिलकुल आशा छोड़ दी थी की अब वे ज़्यादा दिन जी पाएंगी( परिवार में जब इस तरह की बातें हो रहे थीं तो वे रानी सा तक भी पहुंचीं और उन्होंने अपनी माता जी से पूछा की , माँ क्या मैं अब नहीं बचूँगी” उनकी माँ ने उन्हें कहा कि मैं तुम्हारी माँ थोड़े ही हूँ तुम्हारी मान तो दुर्गा माँ हैं जाओ उनसे ही पूछो( इसके बाद रानी सा दुर्गा माँ के मंदिर गयीं और घंटो उनके पास बैठकर अपने बन की बातें कहती रहीं( यक बाद जब वे वापस घर लौटीं तो उनका स्वस्थ्य पहले से ठीक अनुभव हुआ और बहुत ही जल्द वे पूर्णतः स्वस्थ हो गयीं( इस घटना ने माँ दुर्गा  के प्रति उनकी निष्ठां को और भी प्रगाढ़ कर दिया(

बाबा ने दिल की बात सुनी
सन् 1997 में रानी सा जब पहली बार मैं  ब्रह्माकुमारीज़ के  माउंट आबू  स्थित अन्तर्राष्ठट्रीय मुख्यालय पांडव भवन मुझे  असीम शांति और प्रेम की अनुभूति हुयी ( इस दौरान तत्कालीन संस्था की मुख प्रशासिका दादी प्रकाशमणि , अतिरिक्त मुख्या रशासिकपो दादी गुलज़ार जी तथा  महासचिव भ्राता  निर्वैर  जी से मिलने का सुअवसर भी प्राप्त  हुआ  ( उनके अध्यात्मिक अनुभवों से मुझे बहुत ही प्रभावित किया तथा मेरे मन में एक प्रेरणा जाग उठी कि मुझे भी इस जैस\अ श्रेष्ट योगी बनना है ( बचपन में हम एक कहानी सुनते थे कि तिब्बत की पहाड़ियों में ज्ञान गंज नामक जगह है जहां संसार के महानतम योगी और ऋषि मुनियों का निवास स्थान है ( पांडव भवन में मैंने बचपन की उस परिकल्पना को  साकार होते हुए देखा () यहाँ के साधारण से साधारण व्यक्ति भी एक महान और श्रेष्ट योगी था और जिसकी ओर भी देखती है एक दैवीय आभामंडल जैसा अनुभव होता था | हालाँकि यहाँ आने से पहले मेरे मन बहुत संशय था कि भला ऐसी भी कोई जगह हो सकती है जहां लोग परमात्मा से मिलते हों, पर फिर भी अपने गुरु द्वारा सुने हुए कुछ महावाक्य मुझे यहाँ खींच लाये थे (  उन्होंने अपनी एक पुस्तक में लिखा था कि अबू पर्वत ही वो स्थान है संसार के श्रेष्टतम तपस्वी और योगियों का निवास स्थान है | और पांडव भवन में ये सभी अनुभव करने पर मेरे मन का विश्वास बढ़ता ही गया ( जिस दिन हम वहाँ पहुंचे वो परमात्म अवतरण का दिन था तथा इसी दिन परमात्मा का अवतरण दादी गुलज़ार के तन में होना था ( मेरी एक इच्छा थी कि यदि यदि सच में ये परमात्मा ही हैं तो मुझे यह देवी माँ के विषय में कुछ अवश्य कहेंगे ( परमात्म मिलन लगभग पूरा हो चूका था और माँ के सन्दर्भ के कोई भी बात नहीं हुयी , मैं थोडा मायूस हो गयी , तभी अचानक मैंने सुना कि “मात पिता और जगदम्बा माँ का सभी को याद प्यार स्वीकार हो ” ( मेरा मन आनंद विभोरे हो उठा
घर जैसा अनुभव होता है 
रानी सा ने बताया कि मुख्या रूप से जो अनुभूति उन्हें सबसे अधिक खींचती थी वो थी एक घर जैसी अनुभूति | जब भी वे स्थानीय राजयोग केंद्र अथवा माउंट अबू स्थित मुख्यालय में जातीं तो उन्हें हमेशा ऐसा अनुभव होता जैसे मनो वो अपने पिता के घर आ गयी हों | यहाँ के भाई बहनों द्वारा मिलने वाला स्नेह एक अतीन्द्रिय सुच की अनुभूति करने वाला होता है और मुझे कभी अपने लौकिक पिता के घर जाने का ख्याल ही नहीं अत क्यूंकि मुझे तो लगता है जैसे मैं रोज़ अपने पिता के घर ही जाती हूँ |
गुरुमंत्र लेते ही हुई सच्चे गुरु कि प्राप्ति
जब काफी समय तक अध्यात्मिक खोज करने के बाद भी रानी सा को अपने अध्यात्मिक प्रश्नों के उत्तर न मिले तो उन्होंने निर्णय किया कि अब वो कोई गुरु करें और उनके द्वारा अपने इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करें ( इस निर्णय में उनके किसी सम्बन्धी ने उन्हें दतिया पीताम्बर शक्ति पीठ से गुरुमंत्र लेने की प्रेरणा दी और रानी सा ने ऐसा ही किया ( साथ ही अपने गुरु मंत्र को स्मृति में लाते हुए  एक संकल्प किया कि अब मुझे अपने प्रश्नों के सही उत्तर मिल जायेंगे( और संयोग कहें या परमात्म अनुकम्पा कहें उसी दिन जब वे घर पहुँची तो वहाँ एक ब्रह्माकुमारी बहन तलसा जी पधारी हुयी थीं और कुछ ईश्वरीय ज्ञान चर्चा कर रही थीं ( तत्पश्चात  उन्होंने रानी सा ठाठ उनके राज परिवार के सभी सदस्यों को ७ दिवसीय राजयोग की शिक्षा दी और रानी सा के मन के उठने वाले सभी अध्यात्मिक प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर भी दिए ( परन्तु अब भी रानी सा को सम्पूर्ण निश्चय नहीं हुआ था कि यह ही वो सत्य मार्ग है जिस पर चलकर अपने जीवन का आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता  है|
 
मेरे मन के सभी संशय तो दूर हो ही गए, साथ मन के सभी अध्यात्मिक प्रश्नों का भी समाधान  हो गया और जीवन के लक्ष्य की स्पष्टता भी मिली | ब्रह्मकुमारीज़ द्वारा यह एक विश्व कल्याण का कार्य चल रहा है और यह कार्य केवल महिलाओं के लिए ही नहीं मालकी समाज के सभी वर्गों के लिए किया जा रहा है . जाती धर्म, रंग अदि का कोई भी भेद यहाँ नहीं किया जाता तथा सच्चे सच्चे अर्थ में वसूधैव कुटुंबकम की भावना रखकर सर्व प्रति निस्वार्थ सेवा की जाती है | आज कि दौड़ भाग वाली तेज़ रफ़्तार से चलती हुयी ज़िन्दगी में यदि शांति के कुछ पल अनुभव करने हो तो आप यहाँ कर सकते है, और यदि इच्छा एक ऐसे सुंदर शातिमय जीवन कि हो तो यहाँ सिखाये जाने वाली राजयोग की शिक्षा से आप भी अपना जीवन ऐसा स्वर्णिम बना सकते हैं |